Monday, May 2, 2011

आतंक से मुक्ति की बधाई।

ब्लोग्गेर्स भाइयों अप सब को मेरा शादर नमस्कार
ओसामा के आतंक से मुक्ति की बधाई। न जाने उसने कितने मासूमों की जान लिए है। कितना घर सुना किया है.

Thursday, December 30, 2010


ब्लागर भाइयो को नववर्ष की ढेर सारी शुभकामना। आप सब यूंही ब्लाग के माध्यम से जुड़ें और जोड़े। हर समाज कुछ न कुछ रचता रहता है पर रचना सार्थक और सकारात्मक होनी चाहिए। अक्षम बच्चों के प्रति आपसब के संवेदनशील रुख को सलाम। आज मैं फिर अपनी कविता की वही चार पंक्ति लिख रहा हूं जो पिछले साल लिखा था.. .जो कल बीता वा आज नहीं,
जो आज यूंही ढल जाएगा
तुम रचते रहना पल-पल कुछ
तो वक्त संभलता जाएगा।


आप सब से ढेर सारी बातें करनी है। पर एक महत्वपूर्ण जानकारी के साथ आपसे अगले पोस्ट तक के लिए बिदा ले रहा हूं।जानकारी : नवजात शिशु में 67 फीसदी को पीलिया होता ही होता है लेकिन उनका थायरायड लेवल जरूर चेक करवाएं। डॉक्टरों ने बताया है कि 20 से 25 दिन के बच्चे का टीएसएच 9 प्वाइंट तक नार्मल है लेकिन उससे ज्यादा बढऩे पर उसके ब्रेन का विकास नहीं होता है। मेरे नवजात बेटे जो अभी एक महीने और 5 दिन का है टीएसएच 11.२ है। डॉक्टरों ने इसे चिंता का विषय बताते हुए फिर से हफ्ते भर में टेस्ट कराने को कहा है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि घबराने की कोई बात नहीं 25 एमजी की दवा चलाने से वह नार्मल रेंज में आ जाएगा। मैं अपने संघर्ष की बातें सांझा करना चाहता हूं ताकि जो मैं भोग रहा हूं दूसरे न भोगें।शुभ रात्रि.. .

Friday, August 13, 2010

सभी ब्लॉगर भाइयों को और नन्हे-नन्हे मासूमों को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामना

सभी ब्लॉगर भाइयों को और नन्हे-नन्हे मासूमों को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामना।
विनती है कि वो सारी व्याधियों से मुक्त हों और स्वस्थ रहें।

Monday, May 24, 2010

मैं तो बीमार था, मुझे पापा ने क्यूं छोड़ा ?

यह ब्लॉग अक्षम बच्चों के संघर्ष को समर्पित है।
जब अपनों का भरोसा टूटता है तो एक पल के लिए पूरी दुनिया अंधेरी हो जाती है। उस अंधेरे से लड़कर बाहर आना दूसरों के लिए उम्मीद की एक चराग रोशन करना है। गीता वर्मा ने जालंधर की एक ऐसी ही दास्तान भेजी जो कुछ दिन पहले भास्कर में प्रकाशित हुई थी।
मैडम मेरे नाम के साथ दुग्गल मत लगाना। मैं पति का नाम नहीं लगाना चाहती। उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी...
जया के बेटे का पूरा शरीर एक बीमारी ने डस लिया। हाथ-पैर नकारा हो गए। आवाज चली गई। बचा तो सिर्फ दिमाग। पढ़ाई-लिखाई बंद हो गई। स्कूल वालों ने राहुल को एडमिशन देने से मना कर दिया। पति ने कहा, वह अपनी सैलेरी इसके इलाज पर खराब नहीं करेगा। इसके बाद तो जैसे उसकी जिंदगी में तूफान आ गया। जया लुधियाना की हैं। राहुल जब 9 साल का था तो एक दिन अचानक भारी दस्त के बाद उसके पैरों में कमजोरी आ गई। राहुल के शरीर ने काम करना बंद कर दिया। हाथों में जान नहीं रही। पैरों से हरकत गायब हो गई। शब्दों ने मुंह का साथ छोड़ दिया। उन्होंने राहुल को कई डॉक्टरों को दिखाया पर किसी को कुछ समझ नहीं आया। यहीं तक होता तो ठीक था। रोज-रोज की भागम-भाग से झल्लाए पति ने एक दिन कह दिया कि राहुल कभी ठीक नहीं होगा। इस पर समय और पैसा खराब मत करो। इसकी जगह एक और बच्चा पैदा कर लेते हैं। जया जब इसके लिए तैयार नहीं हुई तो पति ने कहर ढा दिया। दूसरी शादी रचा ली। इसके बाद वह पति से अलग हो गई और उसमें और ताकत आ गई। उसने ठान लिया कि वह उसे ठीक करके रहेगी। उसे दिल्ली ले गई। अपोलो में जांच के बाद पता चला कि उसे मायलाइटिस पोर्स वायरल है। यह तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाला रोग है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. पीएन रंजन ने बताया कि इस वायरल का कोई निश्चित इलाज नहीं है। फिजियोथैरेपी और एक्सरसाइज के जरिए कुछ मदद जरूर मिल सकती है। उन्होंने राहुल को भी समझाया कि हिम्मत उसे ही करनी होगी। अपने घर हैबोवाल आकर मां-बेटे दोनों 12-12 घंटे तक एक्सरसाइज करते। राहुल थक जाता पर मां का हौसला उसे और हिम्मत देता। फिजियोथैरेपिस्ट के हर निर्देश का पालन करते। मां के त्याग ने राहुल को मानसिक रूप से बहुत मजबूत बनाया। प्रयास रंग लाया। 6 माह में वह बोलने लग गया।इसके बाद राहुल को लगा कि वह ठीक हो सकता है। मां ने उसे बोलकर पढ़ाना शुरू किया। बहन नेहा उसके लिए लिखने की प्रैक्टिस करती। राहुल ने इतना रिकवर किया कि उसने 8वीं के पेपर स्ट्रैचर पर लेट कर दिए। अच्छे नंबरों ने उसका आत्मविश्वास और बढ़ाया। वह 10वीं के पेपर की तैयारी में जुट गया। वह घंटों बोलने की प्रैक्टिस करता और बहन लिखने की। स्कूल वालों ने दाखिला नहीं दिया तो उसने प्राइवेट पेपर दे दिए। अब इंतजार था रिजल्ट का। रिजल्ट आया तो राहुल ने सबसे ज्यादा नंबर पाए थे। लगन देखकर भारती विद्या मंदिर स्कूल ऊधम सिंह नगर ने उसे एडमिशन दे दिया। 12 वीं में जब उसने टॉप किया तो प्रिंसीपल सुनील अरोड़ा ने कहा, राहुल ने साबित कर दिया कि उसे दाखिला देना गलत निर्णय नहीं था। इसके बाद राहुल ने बीसीए ज्वाइन किया और पहले ही साल पंजाबभर में फस्र्ट आकर मां का नाम रोशन किया।सीखिए, ऐसे करते हैं दर्द का सामना राहुल के हाथ अभी भी तेजी से नहीं चलते। प्रैक्टिस के दौरान पेपर 7 घंटे में हल करता है। रात-रात भर उसे भयंकर दर्द होता है। कराहने की बजाय वह इस दर्द को पढ़ाई कर भूलने का प्रयास करता है।

Monday, May 10, 2010

कहने को सारा जहान अपना

इस दुनिया में पैसा को सबकुछ मानने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है और आदमी को सबकुछ मानने वालों की संख्या कमइस जहान में आदमी को आदमी का साथ चाहिए। पैसा तो हम कहीं से लोन भी ले सकते हैं, आदमी कहां से लोन लें? लोगों के दिए भरोसे पर सोचते हुए जो ख्याल आया वो है.. .. .. .. .. ..
कहने को सारा जहान अपना था,
जब मांगा तो सब हवा हुए,
सब सपना था।।
कहने को सारा जहान अपना था।
ये जीवन माटी-ढेला सब,
बस राम नाम ही जपना था
सब सपना था।
सब कह के गए थे आएंगे,
जीवन भर साथ निभाएंगे,
हम राह तके और थके-थके,
हिस्से जो मिला तड़पना था,
सब सपना था।

Tuesday, April 20, 2010

नशे में गिरफ्तार पंजाब का बचपन


नशे का कोई सिद्धांत या उसूल नहीं होता, नशा तो सिर्फ गुलामी की भाषा समझता है। अपने आस-पास फटकने वाले कर शख्स को वह अपना गुलाम बना लेना चाहता है और फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे बर्बादी की तस्वीर खींचता है। नशा देश के लगभग सभी हिस्सों में अपना फन फैला रहा है। लेकिन हाल में पंजाब की जो तस्वीर सामने आई है उससे भारत के भविष्य पर ग्रहण लगता दिख रहा है। नशे के दलदल में फंसे बच्चों की जो तस्वीर दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ के ब्यूरो चीफ ब्रज मोहन सिंह ने खींची है उसे साभार प्रस्तुत कर रहा हूं।

पंजाब के लोगों ने आतंकवाद का डटकर मुकाबला किया और उसे शिकस्त भी दी, लेकिन यही सूबा अब नशे के खिलाफ जंग हारता दिख रहा है। पंजाब के वयस्कों में नशे की लत खतरनाक स्तर को पार कर चुकी है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात है, वह ट्रेंड जिसके चलते पंजाब के ज्यादातर जिलों में बच्चे 10-11 साल की उम्र से किसी न किसी तरह का नशा करने लगते हैं। इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन ने पंजाब में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति की स्टडी करने के लिए राज्य के 4 सरहदी जिले गुरदासपुर, अमृतसर, तरनतारन के 80 गांवों में सर्वे किया। इसमें अलग-अलग उम्र के 1527 लोगों से बातचीत की गई। ये सभी ऐसे थे, जो किसी न किसी तरह के नशे का इस्तेमाल करते थे। सर्वे के नतीजे चौंकाते हैं। सर्वे में शामिल 77 फीसदी नशा करने वालों की उम्र 11 से 18 साल के बीच है। पंजाब के फिरोजपुर जिले में 10 फीसदी ऐसे बच्चे मिले, जिन्होंने 10 साल से कम उम्र में ही ड्रग्स लेनी शुरू कर दी। उन्हें इस दलदल में धकेलने वाला कोई और नहीं बल्कि परिवार के लोग और उनके नजदीकी दोस्त हैं। फिरोजपुर में रामकोट गांव के 8 से 10 साल के बच्चों ने बताया कि उन्होंने घरवालों को देखकर ही नशा करना सीखा है। पंजाब एंटी-ड्रग कंट्रोल सेल के आर।पी. मीणा कहते हैं, नशे की समस्या इस हद तक गंभीर है कि पुलिस अधिकारियों को बच्चों को ड्रग्स के नुकसान के बारे में स्कूल जाकर बताना पड़ रहा है। नशे की आदत पर लगाम लगाने के लिए हम स्कूलों में जाकर पर्चियां बांट रहे हैं।


सरकारी निगहबानी में चल रहा धंधा


शहरी इलाकों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में नशे की समस्या ज्यादा जटिल है। पंजाब सरकार सालों से कह रही है कि वो सबस्टांस ड्रग्स के ऊपर कड़ी निगरानी रख रही है, लेकिन सब कुछ यहां पेन किलर की आड़ में हो रहा है। मार्फिन वाली नशीली दवाइयां भी खुलेआम बिक रही हैं। पंजाब हेल्थ एंड ड्रग कंट्रोलर विंग के भाग सिंह कहते हैं कि सरकार की तरफ से कड़े निर्देश हैं कि बिना डॉक्टर के पर्चे के कोई भी नशीली दवा न दी जाए।अगर कोई ऐसा करता है तो उनके लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है। अधिकारियों के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन सर्वे में शामिल 31 फीसदी लोगों ने ये बात कबूल की कि वो सिंथेटिक ड्रग्स की खरीद अपने गांव के मेडिकल स्टोर से ही करते हैं। स्पष्ट है कि सब कुछ सरकार की नाक के नीचे चल रहा है। नशे के बढिय़ा बाजार के चलते पंजाब के ग्रामीण और शहरी इलाकों में सिंथेटिक ड्रग्स सप्लाई करने वालों की एक चेन बन गई है। इन्हें राजनीतिक संरक्षण मिला होता है और पुलिस भी इनके खिलाफ कार्रवाई से हिचकती है। इस धंधे में ड्रग्स की बाकायदा होम डिलीवरी भी होती है। पंजाब में 11 फीसदी लोगों ने माना कि भुक्की की खेती पंजाब के गांवों में हो रही है, सरकार भले ही कुछ कह ले।

Wednesday, April 7, 2010

अमेरिकी हमले के कारण इराक में पैदा हो रहे विचित्र बच्चे

हमला किसी के हक में नहीं होता, हमला का गला घोंटना होगा। इराक में शांति के नाम पर जो अमेरिकी हमले हो रहे हैं, उसका खमियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। दो हमलावरों की भ_ी में मासूमों की जिन्दगी झोंकी जा रही है। हमारी दुआ है कि हमलावरों को चेतना आए और वा समझौते की सरहद पर बैठकर शांति की तस्वीर खींचे। कुछ दिनों पहले इराक की जो तस्वीर खबरों के माध्यम से सामने आई है उसे आपसबों के समक्ष रख रहा हूं।
इराकी शहर फलूजा में अमेरिकी हमले के बाद से बच्चों में पैदाइशी खामियों के मामले बढ़ गए हैं। हालत इतनी खराब है कि नवजातों में सिर्फ हृदय संबंधी गड़बडिय़ों के मामले यूरोप की तुलना में तेरह गुना अधिक हैं। इराकी राजधानी से 40 मील पश्चिम में स्थित यह शहर नवंबर 2004 में अमेरिकी अभियान के दौरान भयानक संघर्ष का गवाह बना था। तब अमेरिकी फौज ने हमले में व्हाइट फास्फोरस व डिप्लीटेड यूरेनियम का इस्तेमाल किया था। डॉक्टर बच्चों में पैदायशी बीमारियों व खराबी के लिए इसे ही वजह मानते हैं। शिशुरोग विशेषज्ञ समीरा अल अनी के मुताबिक वे नवजात बच्चों में हृदय विकार के दो-तीन मामले वे रोज देख रही हैं। 2003 के पहले एक माह में ऐसा एक मामला सामने आता था। ऐसे मामलों की दर प्रति हजार बच्चों में 95 है, जो यूरोप की तुलना में 13 गुना अधिक है। कैसे-कैसे विकार : हृदय विकार, लकवा अथवा मस्तिष्क को नुकसान पहुंचने के मामले, बच्चों में तीन सिर, माथे पर आंख, हाथ में नाक पाए जाने जैसे कई मामले हैं। अमेरिकी फौज ने पल्ला झाड़ा: अमेरिकी सेना के प्रवक्ता माइकल किलपैट्रिक ने दावा किया कि सेना स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को गंभीरता से लेती है। उन्होंने कहा, 'पर्यावरण को लेकर ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया।
गाजा पïट्टी में भी यही करुण कथा
इजरायल द्वारा नवंबर 2008 में गाजा पïट्टी के फलस्तीनी इलाकों पर की गई कार्रवाई के बाद वहां भी बच्चों में जन्मजात विकृतियों के मामले बढ़े हैं। एक मानवाधिकार संगठन कांशस आर्गनाइजेशन फॉर ह्यïूमन राइट्स के मुताबिक इजरायली हमले के तीन माह पहले इलाके में जन्मजात खामियों वाले सिर्फ 27 बच्चे पैदा हुए थे। 2009 में यह संख्या अचानक बढ़कर 59 हो गई। इजरायल ने जाबालिया, बेइत, हनाउन व बेइत लाहिया जिलों पर व्हाइट फास्फोरस जबर्दस्त बमबारी की थी और जन्मजात खामियों के मामले भी यहीं अधिक पाए गए हैं।