Tuesday, March 10, 2009

नन्हें पंखों को होली की शुभकामना

रंगों सा खिलो/ उमंगों से मिलो/गुलाल से भी गुलाबी दिन हों तुम्हारे/हंसो, खिलखिलाओ रहो सब के प्यारे। नन्हें पंखों आपको ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद। हमारे बï्ïलॉग पर पधारने वाल ब्ïलागरों सहित समाज की सार्थक रचना में जुड़े सभी ब्ïलॉगरों को होली की शुभकामना।यह ब्ïलॉग अक्षम बच्चों के संघर्ष को समर्पित है। इस यज्ञ में आपके योगदान की अपेक्षा है।

Sunday, March 8, 2009

अपने लिए जिए तो क्या जिए.. .

अपने को तो सब संवारते हैं, खुद के लिए तो सभी जीते हैं। दूसरों के लिए जीने का हौसला कोई-कोई ही रखता है। मीना खन्ना एक ऐसी ही महिला है। एक रिक्शा चालक की बेटी होने और घरों में आया का काम करने के बावजूद मीना आज झुग्गी झोपड़ी के नन्हें पंखों को संवारने में जुटी है। वह कहती है कि खुद ज्यादा न पढ़ सकी तो क्या इन बच्चों को उनका आकाश ढूंढने में जरूर मदद करेगी। पिता रिक्शा चलाकर घर चलाते रहे और मीना आर्थिक तंगी के बीच पली बढ़ी। उसने गरीबों की इच्छाओं को दफन होते देखा था। मीना सुबह पढ़ाई करती और शाम में दूसरों के घरों में आया का काम करती।
मीना बताती है कि शादी के बाद जब उसने अपने पति से बच्चों को पढ़ाते रहने की इच्छा जाहिर की तो उसके पति ने भी उसके हौसले को देखते हुए उसकी मदद की। आज वह चंडीगढ़ के सेक्टर 25 में स्लम के बच्चों को पढ़ा रही है। वह एक कमरा बनवना चाहती है ताकि बच्चों को खुले में न पढऩा पड़े। फिलहाल वह 70 बच्चों को स्लम डॉग मिलियनेयर दिखाने के लिए पैसे जमा कर रही है।

Tuesday, March 3, 2009

उनमें हैं बच्चों के लिए कुछ करने का जज्बा

यह ब्ïलॉग अक्षम बच्चों के संघर्ष को समर्पित है। जो लोग इन बच्चों के संघर्ष में साझीदार हैं, हम उनको सलाम करते हैं। ऐसी ही एक संजीदा महिला हैं 78 वर्षीय प्रोमिला चंद। दैनिक भास्कर चंडीगढ़ के वरिष्ठï पत्रकार गुलशन कुमार ने इनसे बात की और स्पेशल बच्चों के बारे में इनकी प्रतिबद्धता को कुछ यूं बयां किया। हम दैनिक भास्कर से साभार लेकर इसे अपने ब्ïलॉग पर प्रकाशित कर रहे हैं।
बुजुर्ग महिला ने शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए खोला खास तरह का स्कूलउम्र के आखिरी दौर में पहुंच चुकी 78 वर्षीय प्रोमिला चंद्र मोहन ने स्पेशल किड्स के लिए शहर में एक ऐसा सेंटर तो बना दिया है जो बच्चों को जिंदगी में अपने पैरों पर खड़ा होने में सक्षम बना रहा है। पर अभी भी काफी काम बाकी है और प्रोमिला चंद्र मोहन ऐसे बच्चों के लिए ही कुछ साल और मांग रही हैं। प्रोमिला चंद्र मोहन के अनुसार लर्निंग डिसेबिल्टीज, डिसलेक्सिक, ऑटिजम, एडीएचडी, मेंटली चैलेंजड जैसी विभिन्न न्यूरो दिक्कतों से जूझने वाले बच्चों की संख्या शहर और आसपास के राच्यों में लगातार बढ़ रही है, जबकि उनके लिए एक भी ऐसा सेंटर नहीं है जो उन्हें अच्छी तरह से समझ सकें। ऐसे में प्रोमिला चंद्र मोहन ने सेक्टर-36 में एक विशेष सेंटर सोरेम (सोसाइटी फॉर द रिहेबिल्टेशन ऑफ मेंटली चैलेंजड), बनाया है जिसमें बच्चों को सामान्य शिक्षा के साथ ही ऑक्युपेशनल थेरेपी, फिजियो थेरेपी, स्पीच थेरेपी, स्पोर्ट्स, संगीत, योग के जरिए सामान्य करने के प्रयास किए जा रहे हैं। बच्चों के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग का भी इंतजाम है, जिससे वे आगे चल कर रोजगार भी प्राप्त कर सकें। सेंटर में 40 से अधिक बच्चे एडमिशन ले चुके हैं। इन्फ्रॉस्ट्रक्चर के लिए फंड की कमी : प्रोमिला चंद्र मोहन ने बताया कि प्रशासन से जमीन मिलने के अलावा और भी कई लोगों ने सहयोग किया। लेकिन अभी भी पूरा इन्फ्रॉस्ट्रक्चर तैयार करने और सेंटर को पूरी तरह से क्रियान्वित करने के लिए काफी कुछ करना बाकी है। प्रोमिला के अनुसार ऐसे बच्चों के लिए प्रशिक्षकों से लेकर फंड की भी कमी है। बच्चों की थैरेपीज और ट्रेनिंग के लिए उपकरण एवं सामान काफी महंगा है। स्केटिंग रिंक और बॉस्केटबॉल स्टेडियम बन चुका है, जबकि कुछ इन्डोर गेम्स के लिए तैयारी चल रही है। फिलहाल सोसायटी मेंंबर और अन्य दानी लोग ही फंड् आदि का इंतजाम कर रहे हैं लेकिन बच्चों की बढ़ती गिनती के साथ ही सेंटर की आर्थिक जरूरतें भी बढऩा तय है। बच्चों को समझने की जरूरत: बीते पांच दशकों से खेल और शिक्षा से जुड़ी प्रोमिला चंद्र मोहन के अनुसार स्पेशल किड्स की जरूरतें सामान्य बच्चों से अलग होती है। सबसे पहले यह बात उनके मां-बाप को समझनी चाहिए और फिर शिक्षकों को। ऐसे बच्चों को नजरअंदाज करने के बजाए उनकी तरफ विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सही इन्टरवेंशन मिलने से उन्हें भी समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है। एक्सपेरीमेंटल म्यूजिक एवं गेम्स से ऐसे बच्चों को काफी हद तक सामान्य किया जा सकता है।मां-बाप की मुश्किलें: स्पेशल किड्स की विभिन्न थैरेपीज के लिए चंडीगढ़ और मोहाली में एक-दो प्राइवेट सेंटर हैं तो उनकी फीस आम लोगों के बस से बाहर की बात है। सेंटर में आने वाले मां-बाप भी सरकारी संस्थानों से निराश ही दिखते हैं। ऐेसे ही एक अभिभावक ने बताया कि एक सेंटर में काफी क्लोज इन्वायरमेंट में बच्चों को मशीनी अंदाज में थैरेपीज दी जा रही है और फीस भी काफी भारी-भरकम है। जबकि सोरम काफी खुले स्पेस में बना है और फीस भी आम आदमी की पहुंच में है।

Friday, February 27, 2009

बांद्रा के नन्हें पंखों को हमारा सलाम

बांद्रा के नन्हें पंखों को हमारा सलामप्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। पतझड़ में भी चमन गुलजार होता है। बांद्रा की झोपड़पट्टी के नन्हें पंखों रूबीना अली और अजहरुद्दीन मोहम्मद इस्माइल आयुश महेश खेदकर और तन्वी गणेश लोनकर को हमारा सलाम। आप देश के लाल हो, फलो-फूलो और पंखभर अपनी उड़ान भरो, हमारी दुआ है।

Wednesday, February 25, 2009

एक खत प्रकृति को

कभी कहीं से वो हवा आए/कोई बूंद तो मुस्कराए/ कोई किरण तो झिलमिलाए।कहीं तो जरूर छिपा है शक्तिपूंज। प्रकृति तुम्हारे पास तो हर विकल्प है। मेरे खाते में और उनके खाते में भी जो मेरे जैसे हैं, खुशियों का दो-चार कतरा डाल दो। नन्हें पंखों को अपनी उंगली थामकर ले चलो सूरज, इनके हिस्से की चांदनी लौटा दो चांद। इन बेजुबानों को शब्ïदों का सहारा दो प्रभु।हमारे हारे हुए मन पर थकान के जो धूल हैं, उन्हें उड़ा ले जाए हवा, बहा ले जाए झरने। कुछ लोग और विज्ञान जो हमारे विश् वास को हमारा भ्रम करार देते हैं, उसे झुठला दो सर्वशक्तिमान। हवा तेज है और उतनी ही तेज है बेचैनियों की आंधी। मन क्या चाहता है, कई बार समझ नहीं पाता। कुछ ऐसे सवाल होते हैं जिनका जबाब सिर्फ और सिर्फ वक्त के पास होता है। हमारे सिराहने चुपचाप जो खाब बैठते हैं, उन्हें सुबह का पता नहीं होता, वह बंद पलकों में भी जागते रहते हैं। हमें उनके सच होने का इंतजार होता है। मै और मुझ जैसे हालात के साझीदार सभी एक भ्रम को सच करने में तुले हैं। दुनिया और मेडिकल साइंस इसे भ्रम कहते हैंऔर हम जैसे कहते हैं सच तो कहीं है, हल जरूर है, इसी पृथ्वी पर। जब इतनी बीमारियां ठीक हो रही हैं तो सीपी पर साइंस क्यूं पंगू बना बैठा है। ऋषि-मुनियों के इस देश में कोई अद्वितीय शक्ति का बाबा क्यों नहीं सामने आता। जब सारी औषधियां, सारे मेडिसिन धरती पर व्याप्त स्रोतों से ही बने हैं तो सेरिब्रल पाल्सी का हल भी धरती पर मौजूद जड़ी-बूटियों और रसायनों में छिपा होगा। इस दिशा में और शोध किए जाने चाहिए ताकि मझदार में फंसे नन्हें पंख अपना आकाश पा सकें।मेरे हौसलों पर थकान की धूल दिख सकती है पर हारा नहीं हूं मै और ना ही हारे हैं वो सभी मां-बाप। कुशाग्र को अभी सेराजेम की ओर से स्पाइन पर एक कोरियन थेरेपी दी जा रही है।
एक खत प्रकृति कोकभी कहीं से वो हवा आए/कोई बूंद तो मुस्कराए/ कोई किरण तो झिलमिलाए।कहीं तो जरूर छिपा है शक्तिपूंज। प्रकृति तुम्हारे पास तो हर विकल्प है। मेरे खाते में और उनके खाते में भी जो मेरे जैसे हैं, खुशियों का दो-चार कतरा डाल दो। नन्हें पंखों को अपनी उंगली थामकर ले चलो सूरज, इनके हिस्से की चांदनी लौटा दो चांद। इन बेजुबानों को शब्ïदों का सहारा दो प्रभु।हमारे हारे हुए मन पर थकान के जो धूल हैं, उन्हें उड़ा ले जाए हवा, बहा ले जाए झरने। कुछ लोग और विज्ञान जो हमारे विश् वास को हमारा भ्रम करार देते हैं, उसे झुठला दो सर्वशक्तिमान। हवा तेज है और उतनी ही तेज है बेचैनियों की आंधी। मन क्या चाहता है, कई बार समझ नहीं पाता। कुछ ऐसे सवाल होते हैं जिनका जबाब सिर्फ और सिर्फ वक्त के पास होता है। हमारे सिराहने चुपचाप जो खाब बैठते हैं, उन्हें सुबह का पता नहीं होता, वह बंद पलकों में भी जागते रहते हैं। हमें उनके सच होने का इंतजार होता है। मै और मुझ जैसे हालात के साझीदार सभी एक भ्रम को सच करने में तुले हैं। दुनिया और मेडिकल साइंस इसे भ्रम कहते हैंऔर हम जैसे कहते हैं सच तो कहीं है, हल जरूर है, इसी पृथ्वी पर। जब इतनी बीमारियां ठीक हो रही हैं तो सीपी पर साइंस क्यूं पंगू बना बैठा है। ऋषि-मुनियों के इस देश में कोई अद्वितीय शक्ति का बाबा क्यों नहीं सामने आता। जब सारी औषधियां, सारे मेडिसिन धरती पर व्याप्त स्रोतों से ही बने हैं तो सेरिब्रल पाल्सी का हल भी धरती पर मौजूद जड़ी-बूटियों और रसायनों में छिपा होगा। इस दिशा में और शोध किए जाने चाहिए ताकि मझदार में फंसे नन्हें पंख अपना आकाश पा सकें।मेरे हौसलों पर थकान की धूल दिख सकती है पर हारा नहीं हूं मै और ना ही हारे हैं वो सभी मां-बाप। कुशाग्र को अभी सेराजेम की ओर से स्पाइन पर एक कोरियन थेरेपी दी जा रही है।

Sunday, February 15, 2009

धन्यवाद

संगीता पुरी सांकृत्यायन और उड़न जी को नन्हें पंखों को आशीर्वाद देने के लिए धन्यवाद । शब्दों का संबल वास्तविक शक्ति है ।

Sunday, February 1, 2009

कुछ बोलो

माँ ने कहा : नन्हें पंखों कुछ बोलो।
सुना है तुम चाँद से बातें करते हो, चांदनी संग मुस्कुराते हो
/सूरज के साथ जागते खेलते हो फिर हमारे साथ बात क्यों नही करते। एसी तमाम माँ के इंतजार को मै सलाम करता हूँ। इनके उम्मीद का आँचल खुशिओं से भर जाए।