Sunday, March 15, 2009

छल----

जिसे इंसान ने भी छला, भगवान ने भी छला और विज्ञान ने भी छला। ऐसे तन्हा, अपने आप में गुम, खोए-खोए से रहने वाले शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम नन्हे पंखों के बारे में सोचते हुए जो ख्याल आए उन्हें आप सब से बांटना चाहता हूं।
इसे एक कविता के रूप में आप सब के सामने परोस रहा हूं।
शीर्षक छल----
छल, छल से छलक गया, कोई छल गया/ वर्षों से जो यकीं था उनपर बर्फ सा पिघल गया/ कोई छल गया। झूठ के खिलाफ दम भरने वाले जो थे तमाम/उनसे सच भी कहा तो उनको खल गया/ छल, छल से छलक गया, कोई छल गया/सिरफिरों को समझाने की भूल की थी कभी/ अगले ही दिन सारा शहर दहल गया/ कोई छल गया।
अब ये गुस्ताखी फिर कभी नहीं/ कुछ कहते-कहते मैं फिर संभल गया/उनसे सच भी कहा तो उनको खल गया/ छल, छल से छलक गया, कोई छल गया।

2 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

वाह बहुत खूब छल गया उम्दा ...

Santhosh said...

hi..it is nice thing to know that you are writing in your own mother tongue...it is really a great contribution to save and protect our own mother tongue... by the way which typing tool are you using for typing in Hindi...?

Recently I was searching for the user friendly Indian Language typing tool and found.... " quillpad". do you use the same..?

Heard that it is much more superior than the Google's indic transliteration....!? 'quillpad' provides rich text option as well as 9 Indian Languages too...

try this one, www.quillpad.in

For country like India, "English is not enough".

So...Save,protect,popularize and communicate in our own mother tongue....it'll be a great experience...
Jai...Ho..